छत्रपति शिवाजी महाराज का हिन्दू स्वराज्य और सुशासन मंत्र

ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी को शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक समारोह रायगढ़ किले पर संपन्न हुआ | तारिख थी 6 जून 1674 | इस घटना को 340 साल हो रहे हैं | शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक एक युगपरिवर्तनकारी घटना थी | महाराजा पृथ्वीराज सिंह चौहान के बाद भारत से हिंदू शासन लगभग समाप्त हो चुका था | दिल्ली में मुगलों की सल्तनत थी, और दक्षिण में आदिलशाही, कुतुबशाही आदि मुस्लिम राजा राज्य कर रहे थे | सभी जगह इनके सरदार-सेनापति हिन्दू ही रहा करते थे। मतलब यह हुआ कि, हिन्दू सेनाप्रमुखों ने ही हिन्दुओं को गुलाम किया और उन पर विदेशी मुसलमानों की सल्तनत बिठा दी।तब शिवाजी महाराज ने रायगढ़ को अपनी राजधानी बनाया और मुगलों के खिलाफ संघर्ष छेड़ दिया |
छत्रपति शिवाजी महाराज ने 340 साल पहले स्वराज्य, स्वधर्म, स्वभाषा और स्वदेश के पुनरुत्थान के लिए जो कार्य किया, उसकी तुलना नहीं हो सकती। उनका राज्याभिषेक एक व्यक्ति को राजसिंहासन पर बिठाने तक सीमित नहीं था। शिवाजी महाराज एक व्यक्ति नहीं थे, वे एक सोच थे, वे एक विचार थे, वे एक युगप्रवर्तन के शिल्पकार थे। भारत एक सनातन देश है, यह हिन्दुस्थान है, तुर्कस्थान नहीं, और यहां पर अपना राज होना चाहिए। अपने धर्म का विकास होना चाहिए, अपने जीवनमूल्यों को चरितार्थ करना चाहिए। अपने धर्म का विकास होना चाहिए। शिवाजी महाराज का जीवन संघर्ष इसी सोच को प्रस्थापित करने के लिए था। वे बार-बार कहा करते थे कि, ‘यह राज्य हो, यह परमेश्वर की इच्छा है। मतलब स्वराज्य संस्थापना ईश्वरीय कार्य है,मैं ईश्वरीय कार्य का केवल एक सिपाही हूं।’प्रजा के जो धार्मिक कर्मकांड हैं उनको राज्य की ओर से यथाशक्ति मदद भी करनी चाहिए। न्याय सबके लिए समान होना चाहिए। जो उच्च पदस्थ है, उसके लिए एक न्याय और जो सामान्य है, उसके लिए दूसरा न्याय यह अधर्म है। छत्रपति शिवाजी महाराज हिन्दू राजनीति के सिद्धांत अपने राजव्यवहार में कड़ाई से लाए।
ईश्वरीय कार्य की प्रेरणा उन्होंने अपने सभी सहकर्मियों में निर्माण की। हमें लड़ना है, लड़ाई जीतनी है, वह किसी एक व्यक्ति के सम्मान के लिए नहीं, तो ईश्वरीय कार्य की पूर्ति के लिए हमको लड़ना है। जब यह भाव जीवन का एक अविभाज्य अंग बनता है, तब हर एक व्यक्ति में सहस्र हाथियों का बल निर्माण होता है।
शिवाजी महाराज उस जमाने में एक ऐसे युगपुरुष हो गये, जिन्होंने विदेशी सल्तनत से खुद को अलग रखा और अपना स्वतंत्र राज्य निर्माण किया। उनके समकालीन सभासद राज्याभिषेक के संदर्भ में लिखते हैं, भारत भर में म्लेच्छ राजा थे, उनको चुनौती देकर शिवाजी ने अपना स्वतंत्र राज्य निर्माण किया। यह घटना सामान्य नहीं थी।
जब देश परतंत्र हो जाता है तब लोग शासनकर्ता जमात का अनुकरण और अनुसरण करने लगते हैं। समाज का नेतृत्व करने वाले विद्वज्जन, सेनानी, राजधुरंधर परानुकरण में धन्यता मानने लगते हैं। समाज भी इन्हीं लोगों का अनुकरण करता रहता है। धर्म को ग्लानि आती है, परधर्म में जाने वालों की संख्या बढ़ती रहती है। अपने जीवनादर्श से लोग दूर होते रहते हैं। दिल्लीश्वर ही जगदीश्वर हें , ऐसी भावना पनपने लगती है।
भाषा का विकास अवरुद्ध हो जाता है। परकीय भाषा का बोलबाला होता रहता है। मुगल शासन के काल में अरबी, पारसी, तुर्की भाषा का प्रयोग भारत में होने लगा। राजव्यवहार की भी यही भाषा रही।
समर्थ रामदास स्वामी ने इस परानुकरण वृत्ति को वर्णित किया है कि, स्वेच्छा से कोई पीर भक्त बन गये हैं, तो कोई मुसलमान बन रहे हैं। समाज का बौद्धिक नेतृत्व ब्राह्मणों को करना चाहिए, लेकिन वे भ्रष्ट हो गये हैं। राज्य म्लेच्छों के हाथों में गया, और समाज के गुरु कुपात्र व्यक्ति बन गये हैं। जब भारत में अंग्रेजों का शासन आया, तब यही स्थिति बनी रही। अंग्रेजों के काल में अंग्रेजी भाषा का प्रभाव बढ़ा, ईसाइयत का प्रभाव बढ़ा, और लोग ईसाई बनने लगे। स्वतंत्रता के बाद भी, गोरे अंग्रेज चले गये और काले अंग्रेजों का राज शुरू हुआ। परिस्थिति में कोई मौलिक अंतर नहीं आया। अंग्रेजी भाषा का प्रभाव वैसे ही बना रहा और ईसाई बनने की होड़ पहले जैसी ही बनी रही।
शिवाजी महाराज ने मुसलमानी शासनकाल में लुप्त हो रही हिन्दू राजनीति को फिर से पुनर्जीवित किया। हिन्दू राजनीति की विशेषता क्या है? पहली विशेषता यह है कि यह राजनीति धर्म के आधार पर चलती है। यहां धर्म का मतलब राजधर्म है। राजा का धर्म प्रजा का पालन, प्रजा का रक्षण और प्रजा का संवर्धन है। राजा, हिन्दू राजनीति के सिद्धांतों के अनुसार उपभोगशून्य स्वामी है। प्रजा उनके लिए अपनी संतान के समान है। राज्य में कोई भूखा न रहे, किसी पर अन्याय न हो, इसकी चिंता उसे करनी चाहिए। प्रजा अपनी रुचि के अनुसार उपासना पद्धति का अवलंबन करती है, राजा को प्रजा को सब प्रकार का उपासना स्वातंत्र्य देना चाहिए। प्रजा के जो धार्मिक कर्मकांड हैं उनको राज्य की ओर से यथाशक्ति मदद भी करनी चाहिए। न्याय सबके लिए समान होना चाहिए, जो उच्चपदस्थ है, उसके लिए एक न्याय और जो सामान्य है, उसके लिए दूसरा न्याय यह अधर्म है। छत्रपति शिवाजी महाराज हिन्दू राजनीति के सिद्धांत अपने राजव्यवहार में कड़ाई से लाए।
छत्रपति शिवाजी महाराज गो ब्राह्मण जाति के प्रतिपालक थे। ब्राह्मण शब्द का अर्थ होता है, धर्म का अवलंबन करने वाला, विधि को जानने वाला। आज की परिभाषा में कहना हो तो, महाराज यह कहते हैं कि यह राज्य कानून के अनुसार चलेगा।
छत्रपति शिवाजी महाराज ने हिन्दू धर्म की रक्षा का बीड़ा उठाया था, इसका मतलब यह नहीं कि वे इस्लाम के दुश्मन थे। उन्होंने कभी भी कुरान की अवमानना नहीं की, न कोई मस्जिद गिरायी, न किसी फकीर को फांसी के फंदे पर चढ़ाया। उनका नौदल प्रमुख मुसलमान था। लेकिन वे धर्म की आड़ में अगर कोई हिन्दू धर्म पर आघात करता दिखाई देता, तो वे उसे नहीं छोड़ते थे।
गोवा में शिवाजी महाराज की जब सवारी हुई तब कुछ ईसाई मिशनरी पकड़े गये। ये ईसाई मिशनरी डरा धमकाकर हिन्दुओं का मतान्तरण करते थे। शिवाजी महाराज ने उनसे कहा कि यह काम आप छोड़ दीजिए। तब उन्होंने उत्तर दिया कि मतान्तरण करना यह हमारी धर्माज्ञा है, उस पर महाराज ने कहा, अगर ऐसा है तो, हमारी धर्माज्ञा ऐसी है कि, जो मतान्तरण करेगा उसकी गर्दन काट देनी चाहिए और शिवाजी महाराज ने दो मिशनरियों की गर्दन काट दी। सर्वधर्म समभाव का मतलब भोले-भाले हिन्दुओं को डरा धमकाकर ईसाई या मुसलमान बनाना नहीं, यह काम अधर्म का काम है। हिन्दू धर्म के खिलाफ काम है, इसलिए ऐसे काम करने वालों से किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए, इसका एक उदाहरण छत्रपति शिवाजी महाराज ने दिया है।
हम सब शिवाजी महाराज की लड़ाईयों को जानते हैं, लेकिन यह नहीं जानते हैं कि लगभग 36 साल तक उन्होंने राजकाज किया, और उसमें से केवल 6 साल भिन्न-भिन्न लड़ाइयों में उन्होंने बिताए। तीस साल तक वे एक आदर्श शासन की नींव रखने में कार्यरत थे। आज के पारिभाषिक शब्द हैं, सुशासन, विकास, विकास में सबका सहयोग, राष्ट्रीय संपत्ति का समान वितरण, दुर्बलों का सबलीकरण इत्यादि। छत्रपति शिवाजी महाराज ने यह कार्य कैसे करना चाहिए, इसका मानो एक ब्ल्यू प्रिंट हमारे सामने रखा है। अब तक के शासनकाल में दुर्भाग्य से इस पर जितना ध्यान देना चाहिए, इसका जितना अभ्यास करना चाहिए, उतना नहीं हो पाया, लेकिन अब शिवाजी महाराज की इस ब्ल्यू प्रिंट को राष्ट्र जीवन में उतारने का समय आया है, ऐसा लगता है।
राष्ट्र की शक्ति के अनेक अंग होते हैं, उसमें सबसे महत्वपूर्ण अंग सामाजिक ऐक्य भावना का होता है। दूसरा महत्व का अंग उसकी अर्थनीति का होता है। तीसरा महत्व का अंग उसकी परराष्ट्रनीति का होता है, और चौथा महत्व का अंग उसकी सैन्य शक्ति का होता है।
अपना स्वराज्य आर्थिक दृष्टि से स्वावलंबी, और सशक्त बने इसकी ओर शिवाजी महाराज का हमेशा ध्यान रहता था। काश्तकारों को वे मदद देते रहते थे। यह मदद कभी भी नकद राशि के रूप में नहीं दी जाती थी। काश्तकारों को औजार, बीज, बैल आदि साधनों के रूप में मदद दी जाती थी।
अपना सेनादल स्वयंपूर्ण रहे, इस पर छत्रपति शिवाजी महाराज काफी ध्यान दिया करते थे। तोपें बनाने का कारखाना उन्होंने बनाया था। गोला बारूद बनाने का उपक्रम उन्होंने शुरू किया था। अच्छे घोड़ों की पैदाइश हो इस पर उनका ध्यान रहता था। उस समय के लोहे के शस्त्र अपने देश के अंदर ही निर्माण हों, ऐसा उन्होंने प्रयास किया। अंग्रेजों ने उनको अच्छे सिक्के बनाने का एक सुझाव दिया था- मेटलिक कॉईन्स, महाराज ने यह सुझाव ठुकरा दिया और कहा कि, हमारे देसी कारीगर ही सिक्के तैयार करेंगे। राज व्यवहार भाषा का कोष उन्होंने तैयार किया और राज व्यवहार से पारसी, अरबी भाषा को निकाल दिया।
छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक का स्मरण केवल इतिहास का स्मरण नहीं है,अपने राष्ट्र ने अभी करवट बदली है। एक नयी जागृति और नयी चेतना का कालखंड आया है। हमारा राष्ट्र सनातन राष्ट्र है। हमारी अपनी विशेषताएं हैं, हमारा अपना जीवनदर्शन है, हमारी अपनी राजनीतिक सोच है, इन सबको पुनरुज्जीवित करने का कालखंड आया है। हजारों साल तक हम विदेशी लोगों के प्रभाव में रहे, स्वतंत्रता मिलने के बाद भी हमने अपने स्व की कभी खोज नहीं की, हम स्वतंत्र होकर भी तंत्र से परतंत्र रहे। अब सही अर्थ में हमको स्व का बोध करना है, स्व तंत्र की खोज करनी है। काल बदलता है, संदर्भ बदलते हैं, परिस्थिति बदलती है इसलिए छत्रपति शिवाजी की नकल नहीं की जा सकती, नकल करने की आवश्यकता भी नहीं, लेकिन शिवाजी महाराज के तंत्र का हम अभ्यास कर सकते हैं।