परमहंस योगानन्द (5 जनवरी 1893 – 7 मार्च 1952)एक महान आध्यात्मिक गुरू, योगी, संत, लेखक, दिव्यादृष्टा विचारक

Let my soul smile through my heart and my heart smile through my eyes, that I may scatter rich smiles in sad hearts परमहंस योगानन्द (5 जनवरी 1893 – 7 मार्च 1952), बीसवीं सदी के एक महान आध्यात्मिक गुरू, योगी, संत, लेखक, दिव्यादृष्टा विचारक थे। उन्होंने अपने अनुयायियों को क्रिया योग उपदेश दिया तथा पूरे विश्व में उसका प्रचार तथा प्रसार किया। योगानंद के अनुसार क्रिया योग ईश्वर से साक्षात्कार की एक प्रभावी विधि है, जिसके पालन से अपने जीवन को संवारा और ईश्वर की ओर अग्रसर हुआ जा सकता है। योगानन्द प्रथम भारतीय गुरु थे जिन्होने अपने जीवन के….

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सनातन दस महाविद्या पूजा

                                                        ॐ   श्रीं ॐ गजाननं भूतगणादि सेवितं, कपित्थ जम्बूफलसार भक्षितम् , उमासुतं शोक विनाशकारणं, नमामि विघ्नेश्वर पादपङ्कजम् ॥ ॐ ब्रह्मानन्द परम सुखदं, केवलं ज्ञानमूर्तिं, द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं, तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्। एकं नित्यं विमलमचलं, सर्वधीसाक्षिभूतं, भावातीतं त्रिगुणरहितं, सद्गुरू तं नमामि॥ अखण्डानन्दबोधाय, शिष्यसंतापहारिणे। सच्चिदानन्दरूपाय, तस्मै श्री गुरवे नमः ॐ गुरुर्ब्रह्मा गुुरुर्विष्णुः, गुरुरेव महेश्वरः। गुरुरेव परब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नमः ॥ अखण्डमण्डलाकारं, व्याप्तं येन चराचरम्। तत्पदं दर्शितं येन, तस्मै श्री गुरवे नमः ॐ आयातु वरदे देवि! त्र्यक्षरे ब्रह्मवादिनि। गायत्रिच्छन्दसां….

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भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ।।

वैदिक मंत्रों में सुख्यात तथा सर्वाधिक चर्चित मंत्र श्रीगायत्री मंत्र है जिसके मंत्रद्रष्टा ॠषि विश्वामित्र बताये जाते हैं । मान्यता है कि वैदिक मंत्रों का अंतर्ज्ञान अलग-अलग ॠषियों को समय के साथ होता रहा और कालांतर में मुनि व्यास ने उन्हें तीन वेदों के रूप में संकलित एवं लिपिबद्ध किया । उक्त मंत्र 24 मात्राओं के गायत्री छन्द में निबद्ध है और शायद इसीलिए इसे गायत्री मंत्र नाम दिया गया है । यह एक रोचक तथ्य है कि श्रीगायत्री मंत्र का उल्लेख तीनों प्रमुख वेदों में है और इस प्रकार लिपिबद्ध किया गया है- तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो….

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महर्षि दयानन्द के शब्दों में – मूर्ति-पूजा वैसे है । जैसे एक चक्रवर्ती राजा को पूरे राज्य का स्वामी न मानकर एक छोटी सी झोपड़ी का स्वामी मानना ।

न तस्य प्रतिमाsअस्ति यस्य नाम महद्यस: ।                          – ( यजुर्वेद अध्याय 32 , मंत्र 3 ) उस ईश्वर की कोई मूर्ति अर्थात् – प्रतिमा नहीं जिसका महान यश है । * वेनस्त पश्यम् निहितम् गुहायाम ।                             – ( यजुर्वेद अध्याय 32 , मंत्र 8 ) विद्वान पुरुष ईश्वर को अपने हृदय में देखते है । * अन्धन्तम: प्र विशन्ति येsसम्भूति मुपासते ।   ततो भूयsइव ते तमो यs उसम्भूत्या-रता: ।।                            – ( यजुर्वेद अध्याय 40 मंत्र 9 ) अर्थ – जो लोग ईश्वर के स्थान पर जड़ प्रकृति या उससे बनी मूर्तियों की पूजा उपासना करते हैं ।….

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वेद के मंत्र

पुरुष एव इदं सर्वं यद् भूतं यच्च भव्यम्। उतामृतत्वस्य ईशानो यद् अन्नेन अतिरोहति।। पुरुष, ऋक्. 10.90.2> इस सृष्टि में जो कुछ भी इस समय विद्यमान है, जो अब तक हो चुका है और आगे जो भविष्य में होगा, वह सब पुरुष (परमात्मा) ही है। वह पुरुष उस अमरत्व का भी स्वामी है, जो इस दृश्यमान भौतिक जगत के ऊपर है। आज का विज्ञान भी मानता है कि इस दृश्यमान जगत के अंदर की सच्चाई इसके ऊपर से दिखने वाले रूप से सर्वथा भिन्न है। जो कुछ हमें दिख रहा है वह केवल अन्नमय जगत है अर्थात जगत का वह रूप….

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वेद एवं उपनिषदों के महा मंत्र ज्ञान के अजस्त्र स्त्रोत महासागर

। सं गच्छध्वम् सं वदध्वम्।। (ऋग्वेद 10.181.2) अर्थात: साथ चलें मिलकर बोलें। उसी सनातन मार्ग का अनुसरण करो जिस पर पूर्वज चले हैं। प्रथम श्लोक… श्लोक : ।।ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।। -ऋग्वेद अर्थ : उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अंत:करण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे। इस मंत्र या ऋग्वेद के पहले वाक्य का निरंतर ध्यान करते रहने से व्यक्ति की बुद्धि में क्रांतिकारी परिवर्तन आ जाता है। उसका जीवन अचानक ही बदलना शुरू हो जाता है। यदि व्यक्ति किसी भी….

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SAWAMI VIVEKANANAD THE GREATEST SAINT FOREVER !!!

स्वामी विवेकानन्द ( बांग्ला: স্বামী বিবেকানন্দ  जन्म: १२ जनवरी,१८६३ – को कुलीन कायस्थ परिवार में,  ब्रह्मलीन : ४ जुलाई,१९०२ ) विवेकानन्द वेदान्त के विख्यात दार्शनिक, सनातन धर्म के महान विचारक  , प्रभावशाली उपदेशक , युगदृष्टा संत , ब्रह्मज्ञानी आध्यात्मिक गुरु थे। उनका सांसारिक जन्म नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था। उन्होंने अमेरिकास्थित शिकागो में सन् १८९३ में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। भारत का आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वेदान्त दर्शन अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानन्द की वक्तृता के कारण ही पहुँचा। उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की….

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महामृत्युंजय मंत्र

महामृत्युंजय मंत्र के जप व उपासना के तरीके आवश्यकता के अनुरूप होते हैं। काम्य उपासना के रूप में भी इस मंत्र का जप किया जाता है। जप के लिए अलग-अलग मंत्रों का प्रयोग होता है। मंत्र में दिए अक्षरों की संख्या से इनमें विविधता आती है। यह मंत्र निम्न प्रकार से है- एकाक्षरी (1) मंत्र- ‘हौं’। त्र्यक्षरी (3) मंत्र- ‘ॐ जूं सः’। चतुराक्षरी (4) मंत्र- ‘ॐ वं जूं सः’। नवाक्षरी (9) मंत्र- ‘ॐ जूं सः पालय पालय’। दशाक्षरी (10) मंत्र- ‘ॐ जूं सः मां पालय पालय’। (स्वयं के लिए इस मंत्र का जप इसी तरह होगा जबकि किसी अन्य व्यक्ति….

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आ नो॑ भ॒द्राः क्रत॑वो यन्तु वि॒श्वतः Let noble thoughts come to us from every side Rigveda 1-89-1

आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः । देवा नोयथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवेदिवे॥ अर्थ – हमारे पास चारों ओर से ऐंसे कल्याणकारी विचार आते रहें जो किसी से न दबें, उन्हें कहीं से बाधित न किया जा सके एवं अज्ञात विषयों को प्रकट करने वाले हों। प्रगति को न रोकने वाले और सदैव रक्षा में तत्पर देवता प्रतिदिन हमारी वृद्धि के लिए तत्पर रहें। मन्त्र-२ देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवानां रातिरभि नो नि वर्तताम् । देवानां सख्यमुप सेदिमा वयं देवा न आयुः प्र तिरन्तु जीवसे ॥ अर्थ – यजमान की इच्छा रखनेवाले देवताओं की कल्याणकारिणी श्रेष्ठ बुद्धि सदा….

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ॐ शांति शांति शांति सर्वत्र चहुँ और शांति की प्रार्थना

ॐ ! विश्वानि देव  सवितर्दुरितानि परा  सुव ! यद् भद्रंतन्न आ  सुव* !! ॐ ! हे सकल जगत के उत्पत्तिकर्ता ,  समस्त  ऐश्वर्यो  व  सुखो  के  दाता  सर्वशक्तिमान  सूर्य देव ! आप कृपा करके हमारे समस्त दुर्गुण , दुर्व्यसन , दुर्दिनों  एवम  दुःखो  को दूर  कर दीजिये , और  जो कुछ अच्छा  और  कल्याणकारी  है  वह  हमें प्राप्त  कराइए ! Om. vishvani deva savitar-durtani parasuva. Yad bhadram tanna asuva. Om. O God, the creator of the universe and the Giver of all hapiness. Keep us far from bad habits, bad deeds, and calamities. May we attain everything that is auspicious ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:, पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति: वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:, सर्वँ….

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